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एक नवविवाहित युवक अपनी पत्नी को अपनी पसंदीदा जगहों की सैर करा रहा था, सो, वह पत्नी को उस स्टेडियम में भी ले गया, जहां वह क्रिकेट खेला करता था...

अचानक वह पत्नी से बोला, `क्यों न तुम भी बल्ले पर अपना हाथ आज़माकर देखो... हो सकता है, तुम अच्छा खेल पाओ, और मुझे अभ्यास के लिए एक साथी घर पर ही मिल जाए...`

पत्नी भी मूड में थी, सो, तुरंत हामी भर दी और बल्ला हाथ में थामकर तैयार हो गई...

पति ने गेंद फेंकी, और पत्नी ने बल्ला घुमा दिया...

इत्तफाक से गेंद बल्ले के बीचोंबीच टकराई, और स्टेडियम के बाहर पहुंच गई...

पति-पत्नी गेंद तलाशने बाहर की तरफ आए तो देखा, गेंद ने करीब ही बने एक सुनसान-से घर की पहली मंज़िल पर बने कमरे की खिड़की का कांच तोड़ दिया है...

अब पति-पत्नी मकान-मालिक की गालियां सुनने के लिए खुद को तैयार करने के बाद सीढ़ियों की तरफ बढ़े, और पहली मंज़िल पर बने एकमात्र कमरे तक पहुंच गए...

दरवाजा खटखटाया, तो भीतर से आवाज़ आई, `अंदर आ जाओ...`

जब दोनों दरवाजा खोलकर भीतर घुसे तो हर तरफ कांच ही कांच फैला दिखाई दिया, और उसके अलावा कांच ही की एक टूटी बोतल भी नज़र आई...

वहीं सोफे पर हट्टा-कट्टा आदमी बैठा था, जिसने उन्हें देखते ही पूछा, `क्या तुम्हीं लोगों ने मेरी खिड़की तोड़ी है...?`

पति ने तुरंत माफी मांगना शुरू किया, परंतु उस हट्टे-कट्टे आदमी ने उसकी बात काटते हुए कहा, `दरअसल, मैं आप लोगों को धन्यवाद कहना चाहता हूं, क्योंकि मैं एक जिन्न हूं, जो एक श्राप के कारण, उस बोतल में बंद था... अब आपकी गेंद ने इस बोतल को तोड़कर मुझे आज़ाद किया है...

मेरे लिए तय किए गए नियमों के अनुसार मुझे खुद को आज़ाद करवाने वाले को आका मानना होता है, और उसकी तीन इच्छाएं पूरी करनी होती हैं... लेकिन चूंकि आप दोनों से यह काम अनजाने में हुआ है, इसलिए मैं आप दोनों की एक-एक इच्छा पूरी करूंगा, और एक इच्छा अपने लिए रख लूंगा...`

`बहुत बढ़िया...` पति लगभग चिल्ला उठता है, और बोलता है, `मैं तो सारी उम्र बिना काम किए हर महीने 10 करोड़ रुपये की आमदनी चाहता हूं...`

`कतई मुश्किल नहीं...` जिन्न ने कहा, `यह तो मेरे बाएं हाथ का खेल है...`

इतना कहकर उसने हवा में हाथ उठाया, और उसे घुमाते हुए बोला, `शूं... शूं... लीजिए आका, आपकी 10 करोड़ की आमदनी आज ही से शुरू...`

फिर वह पत्नी की तरफ घूमा, और शिष्ट स्वर में पूछा, `और आप क्या चाहती हैं, मैडम...?`

पत्नी ने भी तपाक से इच्छा बताई, `मैं दुनिया के हर देश में एक खूबसूरत बंगला और शानदार कार चाहती हूं...`

जिन्न ने फिर हवा में हाथ उठाया, और उसे घुमाते हुए बोला, `शूं... शूं... लीजिए मैडम, कागज़ात कल सुबह तक आपके घर पहुंच जाएंगे...`

अब जिन्न फिर पति की तरफ घूमा और बोला, `अब मेरी इच्छा... चूंकि मैं लगभग 200 साल से इस बोतल में बंद था, सो, मुझे किसी औरत के साथ सोना नसीब नहीं हुआ... अगर अब आप दोनों अनुमति दें, तो मैं आपकी पत्नी के साथ सोना चाहता हूं...`

पति ने तुरंत पत्नी के चेहरे की ओर देखा, और बोला, `अब हमें ढेरों दौलत और बहुत सारे घर मिल गए हैं, और यह सब तुम्हारी वजह से ही मुमकिन हुआ है, सो, यदि मेरी पत्नी को आपत्ति न हो, तो मुझे इसे तुम्हारे साथ बिस्तर में भेजने में कोई आपत्ति नहीं है...`

जिन्न ने मुस्कुराते हुए पत्नी की ओर नज़र घुमाई तो वह बोली, `तुम्हारे लिए मुझे भी कोई आपत्ति नहीं है...`

पत्नी का इतना कहना था कि जिन्न ने तुरंत उसे कंधे पर उठाया, और दूसरी मंज़िल पर एक बंद कमरे में ले गया, जहां पांच-छह घंटे तक पत्नी के साथ धुआंधार मौज की...

सब तूफान शांत हो जाने के बाद जिन्न बिस्तर से निकलता है, और कपड़े पहनता हुआ पत्नी से पूछता है, `तुम्हारी और तुम्हारे पति की उम्र क्या है...?`

पत्नी मुस्कुराते हुए बोली, `वह 28 साल के हैं, और मैं 25 की...`

जिन्न भी मुस्कुराते हुए तपाक से बोला, `इतने बड़े-बड़े हो गए, अब तक जिन्न-भूतों में यकीन करते हो,

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एक बेटी ने जिद पकड़ ली "पापा मुझे
साइकिल चाहिये !
..
..
पापा ने कहा अगले महीने दिवाली
पर जरुर साईकल
लाउंगा ! प्रॉमिस !
.
.
एक महीने बाद... पापा , मुझे
साइकिल चाहिये , आपने प्रॉमिस
किया था ... !
.
.
वह चुप रहा ...
शाम को दफ्तर से लौटा बेटी
तितली की तरह खुश हुई व़ाह ! थॅंक्स
पापा , मेरी साइकिल के लिये
अगले दिन.... पापा ! आपकी उंगली
की सोने की अंगूठी कहाँ गई .?
.
.
बेटा ! सच बोलूँगा ... कल ही बेच दी
तुम्हारी साइकिल के लिये .....!
.
.
बेटी रोते हुए , पापा, ! पैसों की
इतनी दिक्कत थी तो मत लाते .....
.
.
नहीं खरीदता तो मेरी प्रॉमिस
टूटती
तुम्हे फिर मेरे किसी वादे पे
विश्वास नहीं होता .
तुम यही समझती कि "प्रॉमिस
तोड़ने के लिये
किये जाते है !"
.
.
मेरी अंगूठी दूसरी आ जायेगी
मगर "टूटा हुवा विश्वास
छूटा हुवा बचपन दोबारा नहीं
लौटेंगे !"
जाओ !
साइकल चलाओ !....

अपने से ज्यादा अपनी बेटी की
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तांत्रिक बोध साधना और साहित्य हिंदी पुस्तक मुफ्त डाउनलोड | Tantrik Bodh Sadhana Aur Sahitya Hondi Book Free Download










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मूल नाम : दशहरा

अन्य नाम : विजयादशमी ,बिजोया ,आयुधपूजा। 

प्रकार : धार्मिक और सामाजिक 

उद्देश्य : धार्मिक निष्ठां , उत्सव , मनोरंजन 

तिथि : आश्विन दशमी 

अनुष्ठान : रामलीला , रावणदहन ,आयुध-दहन 

सामान पर्व : नवरात्री 



विजया दशमी भारत का बहुत ही प्रसिद्द त्यौहार है। जो हम क्यों मनाते है आप सब को पता है. की आजके दिन राम ने रावण का वध किया था।,आज ही के दिन बुराई के ऊपर अच्छाई की जित हुई थी 
जिसको हम थोड़ा विस्तार से जानते है 

विजयदशमी अथवा दशहरा 

भूमिका : दशहरा शरद ऋतु में आने वाला त्योहार है यह आश्विन मास की सुक्ल पक्ष  की दशमी को मनाया जाता है।  आज ही के दिन राम ने लंका पति रावण का वध किया था इसलिए ये दिन मनाया जाता है। ये त्यौहार सिर्फ हिन्दू ही नहीं सब जाती के लोग मनाते है ये त्यौहार खास करके क्षत्रिय लोगो के लिए खास माना जाता है। और क्षत्रिय लोग आजके दिन शस्त्र पूजन करते है।

राम का लंका  विजय : जैसे की हमको पता है की राम ने १४ वर्ष तक वनवास बिताया।  बनवास के दौरान रावण ने सीता माता का हरण कर लिया था। तब भगवन श्री राम ने हनुमान और सुग्रीव की मदद से लंका पर युद्ध किया ये एक भयंकर युद्ध चला मेघनाद ,कुंभकर्ण  ओर रावण को मार तभी से ये परंपरा चली आ रही है।


प सभी को दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं 



गुजरात की लोककथा


जटा हलकारा / झवेरचंद मेघाणी



नपुंसक पति की घरवाली-सी वह शोकभरी शाम थी। अगले जन्म की आशा के समान कोई तारा चमक रहा था। अंधेरे पखवाड़े के दिन थे।

ऐसी नीरस शाम को आंबला गांव के चबूतरे पर ठाकुरजी की आरती की सब बाट देख रहे थे। छोटे-छोटे अधनंगे बच्चों की भीड़ लगी थी। किसी के हाथ में चांद-सी चमकती कांसे की झालर झूल रही थी तो कोई बड़े नगाड़े पर चोट लगाने की प्रतीक्षा कर रहा था। छोटे-छोटे बच्चे इस आशा से नाच रहे थे कि प्रसाद में उन्हें मिस्री का एकाध टुकड़ा, नाररियल की एक-दो फांकें तथा तुलसी दल से सुगंधित मीठा चरणमृत मिलेगा। बाबाजी ने अभी तक मंदिर को खोला नहीं था। कुंए के किनारे पर बैठे बाबाजी स्नान कर रहे थे।

बड़ी उम्र के लोग नन्हें बच्चों को उठाये आरती की प्रतीक्षा में चबूतरे पर बैठे थे। सब चुप्पी साधे थे। उनके अंतर अपने आप गहरारई में ब्ैठते जा रहे थे। यह ऐसी शाम थी।

बड़ी उदास थी आज की शाम। अत्यंत धीमी आवाज में किसी ने बड़े दु:ख से कहा, "ऋतुएं मंद पड़ती जा रही है।"

दूसरा इस दु:ख में वृद्वि करते हुए बोला, "यह कलियुग है। अब कलियुग में ऋतुएं खिलती नहीं हैं। खिलें तो कैसे खिलें!"

तीसरे ने कहा, "ठाकुरजी का मुखारबिन्दु कितना म्लान पड़ गया है।"

चौथा बोला, "दस वर्ष पहले उनके मुख पर कितना तेज था।"

बड़-बूढ़े लोग धीमी आवाज में तथा अधमुंदी आंखों से बातों में तल्लीन थे। उसी समय आंबला गांव के बाजार में दो व्यक्ति सीधे चले आ रहे थे। आगे पुरुष और पीछे स्ती्र। पुरुष की कमर में तलवार और हाथ में लकड़ी थी। स्त्री के सिर पर बड़ी गठरी थी। पुरुष को एकदम पहचाना नहीं जा सकता था, परंतु राजपूतनी अपने पैरों कीचाल से ओर घेरदार लहंगे तथा ओढ़नी से पहचानी जाती थी।

राजपूत ने लोगों को ‘राम-राम’ नहीं किया, इससे गांव के लोग समझ गये किये अजनबी हैं। अपनी ओर से ही लोगों ने कहा, ‘राम-राम’।

उत्तर में ‘राम-राम’ कहकर यात्री जल्दी-जल्दी आगे चल पड़ा। उसके पीछे राजपूतनी अपने पैरों की एड़ियों को ढकती हुई बढ़ चली। एक-दूसरे के मुंह की ओर देखकर लोगों ने कहा, "ठाकुर, कितनी दूर जाना है ?"

"यही कोई आधा मील।" जवाब मिला।

"तब तो आत लोग यहां रुक जाइये ? "

"क्यों ? इतना जोर क्यों दे रहे हैं?" यात्री ने कुछ तेजी से कहा।

"इसका कोई खास कारण तो नहीं है, परंतु समय अधिक हो गया और साथ में महिला है। इसी से हम कह रहे हैं। अंधेरे में अकारण जोखिम क्यों लेते हैं? फिर यहां हम सब आपके ही भाई-बंद तो हैं। इसलिए आप रुक जाइये।"

मुसाफिर ने जवाब दिया, "अपनी ताकत का अंदाजा लगा करके ही मैं सफर करता हूं। मार्दों के लिए समय-समय क्या होता है ! अब तक तो अपने से बढ़कर कोई बहादुर देखा नहीं है।"

आग्रह करने वाले लोगों को बड़ा बुरा लगा। किसी ने कहा, "ठीक है, वरना चाहते हैं तो इन्हें मरने दो।"

राजपूत और राजपूतानी आगे बढ़ गये।

दोनों जंगल में चले जा रहे थे। सूर्य अस्त हो गया था। दूर से मंदिर में आरती के घंटे की ध्वनि सुनाई दे रही थी। दूर के गांवों के दीपक टिमटिमा रहे थे और कुत्ते भौंक रहे थे।

मुसाफिर ने अचानक पीछे घुंघरू की आवाज सुी। राजपूतनी ने पीछे मुड़कर देखा तो उसे सणोसरा का जटा हलकारा कंधे पर डाक की थैली लटकाये, हाथ में घुंघरू वाला भाला लिये, जाते हुए दिखाई दिया। उसकी कमर में फटे मयानवाली तलवार लटकी हुई थी। जटा हलकारा दुनिया की आशा-निराशा और शुभ-अशुभ की थैली कंधे पर लेकर जा रहा था। कुछ परदेश गये पुत्रों की वृद्व माताएं ओर प्रवासियों की स्त्रियां साल-छ: महीने में चिटठी मिलने की आस लगाये बैठी राह देखती होगी, यह सोचकर नहीं,बल्कि देरी हो जायेगी तो वेतन कट जरयगा, इस डर से जटा हलकारा दौड़ा जा रहा था। भाले के घुंघरू इस अंधेरे एकांत रात में उसके साथी बने हुए थे।

देखते-ही-देखते हलकारा पीछे चलती राजपूतनी के पास पहुंच गया। दोनों ने एक-दूसरे की कुशल पूछी। राजपूतनी का मायका सणोसरा में था। हलकारा सणोसरा से ही आ रहा था। इसलिए राजपूतनी अपने मां-बाप के समाजचार पूछने लगी। पीहर के गांव से आनेवाले अपरिचित पुरुष को भी स्त्री अपने सगे भाई-सा समझती है। दोनों बातें करते हुए साथ चलने लगे।

राजपूत कुछ कदम आगे था। राजपूतनी को पीछे रह जाते देखकर उसने मुड़कर देखा। दूसरे आदमी के साथ बातें करते देखकर उसने उसको भला-बुरा कहा और धमकाया।

राजपूतनी ने कहा, "मेरे पीहर का हलकारा है। मेरा भाई है।"

"देख लिया तेरा भाई ! चुपचाप चली आ।" राजपूत ने भौंहें चढ़ाकर कहा, फिर हलकारे से बोला, "तुम भी तो आदमी-आदमी को पहचानो।"

ठीक है, बापू !" यों कहकर हलकारे ने अपननी चाल धीमी करदी। एक खेत जितनी दूरी रखकर वह चलने लगा।

जब यह राजपूत जोड़ी नदी पर पहुंची तो एक साथ बाररह आदमियों ने ललकारा, "खबरदार, जो आगे बढ़े ! तलवार नीचे डाल दो।"

राजपूत के मुंह से दो-चार गालियां निकलीं, परंतु म्यान से तलवार नहीं निकल पायी। आंबला गांव के बाहर कोलियों ने आकर उस राजपूत को रस्सी से बांध दिया और दूर पटक दिया।

"बाई, गीहने उतार दो।" एक लुटेरे ने राजपूतनी से कहा।

बेचारी राजपूतनी अपने शरीर पर से एक-एक गहना उतारने लगी। हाथ, पैर, सीना आदि अंग लुटेरों की आंखों के आगे आये। उसकी भरी हुई देह ने लुटेरों की आंखों में काम-वासना उभार दी। जवान कोलियों ने पहले तो उसका मजाक उड़ाना शुरू किया। राजपूतनी शांत रही, लेकिन जब लुटेरे बढ़कर उसके निकट आने लगे तो जहरीली नागिन की तरह फुफकारती हुई राजपूतनी खड़ी हो गई।

कोलियों ने यह देखकर अटटहास करते हुए कहा, "अरे ! उस समी की पूंछ को धरती पर पटक दो !"

अंधेरे में राजपूतनी ने आकश की ओर देखा। जटा हलकारा के घुंघरू की आवाज उसके कानों में पड़ी।

राजपूतनी चीख उठी, "भाई, दौड़ो ! बचाओ !"

हलकारे ने तलवार खींच ली और पलक मारते वहां जा पहुंचा। बोला, "खबरदार, जो उस पर हाथ उठाया !"

बारह कोली लाठियां लेकर उस पर टूट पड़े। हलकारे ने तलवार चलायी और सात कोलियों को मौत के घाट उतार दिया। उसके सिर पर लाठियों की वर्षा हो रही थी, परंतु हलकारे को लाठियों की चोट का पता ही नहीं था। राजपूतनी ने शोर मचा दिया। मारे डर के बचे हुए लुटेरे भाग गये। उनके जाते ही हलकारा चक्कर खाकर गिर पड़ा ओर उसके प्राण-पखेरू उड़ गये।

राजपूतनी ने अपने पति की रस्सियां खोल दीं। उठते ही राजपूत बोला, "अब हम चलें।"

"कहां चलें?" स्त्री ने दु:खी होकर कहा, "तुम्हें शर्म नहीं आती ! दो कदम साथ चलनेवाला वह ब्राह्राण, घड़ी भर की पहचान के कारण, मेरे शील की रक्षा करते मरा पड़ा है। और मेरे जन्म भर के साथी, तुम्हें अपना जीवन प्यारा लगता है ! ठाकुर, चले जाओ अपने रास्ते। अब हमारा काग और हंस का साथ नहीं हो सकता। मैं तो अब अपने बचानेवाले ब्राह्राण की चिता में ही भस्म हो जाऊंगी !"

"ठीक है, तेरी जैसी मुझे और मिल जायगी।" कहता हुआ राजपमत वहां से चला गया।

हलकारे के शव को गोद में लेकर राजपूतनी सवेरे तक उस भयंकर जंगल में बैठी रही। उजाला होने पर उसने इर्द-गिर्द से लकड़ियां इकटठी करके चिता रची। शव को गोद में लेकर स्वयं चिता पर चढ़ गई। अग्नि सुलग उठी। दोनों जलकर खाक हो गये। कायर पति की सती स्त्री जैसी शोकातुर संध्या की उस घड़ी में चिता की क्षीण ज्योति देर तक चमकती रही।

आंबला और रामधारी के बीच के एक नाले में आज भी जटा और सती की स्मृति सुरक्षित है।




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